Jharkhand High Court: कर्मचारियों की बड़ी खबर, विभागीय परीक्षा देरी से भी नहीं छिनेगा सेवा लाभ, ACP-MACP लाभ देने का आदेश बरकरार
झारखंड हाई कोर्ट ने कर्मचारी को ACP-MACP लाभ देने के मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज की। 1980 से सेवा की गणना करने का आदेश बरकरार रखा।

रांची। सरकारी नौकरी में वर्षों तक सेवा देने के बाद भी अगर कर्मचारी को वित्तीय लाभ नहीं मिले, तो यह उसके लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। झारखंड हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में कर्मचारी के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभागीय परीक्षा देर से पास करने के आधार पर कर्मचारी की करीब 19 साल की सेवा को एसीपी और एमएसीपी के लाभ की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। साथ ही कर्मचारी रवींद्र प्रसाद को प्रथम और द्वितीय एसीपी तथा तृतीय एमएसीपी का लाभ देने के एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।
19 साल की सेवा को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
मामला सरकारी कर्मचारी रवींद्र प्रसाद को एसीपी और एमएसीपी का लाभ देने से जुड़ा है। एकल पीठ ने 9 अप्रैल 2025 को आदेश दिया था कि कर्मचारी की सेवा अवधि की गणना 15 अप्रैल 1980 से की जाए, न कि 23 अगस्त 2009 से।दरअसल, रवींद्र प्रसाद ने 23 अगस्त 2009 को विभागीय परीक्षा पास की थी। राज्य सरकार का तर्क था कि उन्होंने नियुक्ति के बाद निर्धारित समय में परीक्षा पास नहीं की, इसलिए उनके वित्तीय लाभ की गणना परीक्षा पास करने की तारीख से की जानी चाहिए।
हालांकि, हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कर्मचारी 15 अप्रैल 1980 से लगातार सेवा दे रहे थे। उनकी सेवा वर्ष 1982 में समाप्त भी नहीं की गई थी। ऐसे में शुरुआती करीब 19 वर्षों की सेवा को लाभ की गणना से बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं है।
ACP-MACP का उद्देश्य कर्मचारियों को वित्तीय राहत देना
अदालत ने अपने फैसले में एसीपी और एमएसीपी योजनाओं के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। खंडपीठ ने कहा कि इन योजनाओं का मकसद लंबे समय तक एक ही पद पर काम करने के कारण कर्मचारियों को होने वाले सेवा संबंधी ठहराव की भरपाई करना है।एसीपी और एमएसीपी वास्तविक पदोन्नति नहीं, बल्कि वित्तीय उन्नयन की योजनाएं हैं। इसलिए इनके लाभ के लिए पदोन्नति वाले पद की योग्यता पर अनावश्यक जोर देना योजनाओं के मूल उद्देश्य को विफल कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अमरेश कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला दिया गया था। सरकार ने दलील दी थी कि उक्त फैसला रवींद्र प्रसाद के मामले में लागू नहीं होता।
लेकिन खंडपीठ ने सरकार की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप एकल पीठ का आदेश न्यायसंगत और उचित है। इसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
सरकार की अपील खारिज, कर्मचारी को मिलेगा तीनों वित्तीय उन्नयन का लाभ
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही एकल पीठ का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें रवींद्र प्रसाद को उनकी सेवा अवधि के अनुसार प्रथम और द्वितीय एसीपी तथा तृतीय एमएसीपी का लाभ देने का निर्देश दिया गया था।इस फैसले से स्पष्ट है कि केवल विभागीय परीक्षा देर से पास करने के आधार पर कर्मचारी की पहले से की गई लगातार सेवा को वित्तीय उन्नयन की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता।












