झारखंड : सात महीने की मासूम को हुआ कैंसर, इलाज के लिए पिता भटकता रहा… मां छोड़कर चली गई मायके, हाई कोर्ट ने तलाक बरकरार रखा
झारखंड हाई कोर्ट ने कैंसर पीड़ित बच्ची की देखभाल नहीं करने और पति से अलग रहने के मामले में पत्नी की अपील खारिज की। गुजारा भत्ता 10 से बढ़ाकर 15 हजार रुपये किया।

रांची। एक तरफ जिंदगी से जूझती सात महीने की मासूम बच्ची, दूसरी तरफ उसके इलाज की चिंता में परेशान पिता और इसी बीच मां का घर छोड़कर मायके चले जाना… यह कहानी किसी परिवार के टूटने भर की नहीं, बल्कि एक ऐसी मासूम की पीड़ा से जुड़ी है, जिसे उस उम्र में मां की ममता और माता-पिता दोनों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी।
झारखंड हाई कोर्ट ने इसी मामले में पत्नी की तलाक के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी है। अदालत ने माना कि बीमार बच्ची की देखभाल नहीं करना और लंबे समय तक पति से अलग रहना वैवाहिक क्रूरता और परित्याग के दायरे में आता है। हालांकि, अदालत ने पत्नी के मासिक गुजारा भत्ते को 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया।
कैंसर से जूझ रही थी मासूम, इलाज के लिए मुंबई तक गया पिता
मामला पिंकी कुमारी और रवि कुमार के वैवाहिक जीवन से जुड़ा है। दोनों की शादी 23 नवंबर 2008 को हुई थी। शादी के बाद दोनों जमशेदपुर में रहने लगे। कुछ समय बाद उनके घर बेटी का जन्म हुआ। परिवार में आई इस खुशी के बीच उस समय मुश्किलें खड़ी हो गईं, जब महज सात महीने की उम्र में बच्ची को कैंसर होने का पता चला।
बेटी की गंभीर बीमारी ने परिवार को चिंता में डाल दिया। पति रवि कुमार के अनुसार, बच्ची के इलाज के लिए उसे मुंबई तक ले जाना पड़ा। इस कठिन समय में पिता अपनी बेटी के उपचार में जुटा रहा, लेकिन उसका आरोप था कि पत्नी इलाज के दौरान उसके साथ नहीं गई और बच्ची की देखभाल से भी दूरी बनाए रखी।
पति ने लगाए गंभीर आरोप, अदालत ने साक्ष्यों पर किया विचार
पति ने अदालत में आरोप लगाया कि पत्नी बच्ची के साथ मारपीट करती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी सर्दियों में बच्ची को ठंडे पानी में डाल देती थी और एक बार उसे बालकनी से फेंकने की कोशिश भी की थी।
हालांकि, पत्नी इन आरोपों से सहमत नहीं थी। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयानों और उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि पत्नी ने अपने लिखित जवाब में पति की ओर से लगाए गए आरोपों का स्पष्ट और बिंदुवार खंडन नहीं किया था।
अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि अस्पष्ट या टालमटोल वाला जवाब प्रभावी खंडन नहीं माना जा सकता। ऐसे में जिन तथ्यों का स्पष्ट रूप से खंडन नहीं किया गया, उन्हें स्वीकार किया हुआ माना जा सकता है।
सात महीने की बच्ची को छोड़कर मायके चली गई थी मां
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पत्नी का पति से अलग होना भी रहा। सुनवाई के दौरान पत्नी ने अपनी गवाही में स्वीकार किया कि जब बच्ची महज सात महीने की थी, तभी वह मायके चली गई थी। इसके बाद पति से उसका कोई संपर्क नहीं रहा।
हाई कोर्ट ने इस तथ्य को परित्याग का साक्ष्य माना। अदालत ने कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही छोटी बच्ची की देखभाल नहीं करना और पति से लंबे समय तक अलग रहना वैवाहिक संबंधों में क्रूरता और परित्याग के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
हाई कोर्ट ने खारिज की तलाक के खिलाफ अपील
इस मामले में जमशेदपुर फैमिली कोर्ट ने 24 नवंबर 2021 को पति रवि कुमार की तलाक याचिका स्वीकार कर विवाह विच्छेद का आदेश दिया था। पत्नी पिंकी कुमारी ने इस फैसले को झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने पत्नी की प्रथम अपील पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के तलाक संबंधी फैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी।
पत्नी को राहत, गुजारा भत्ता 10 से बढ़ाकर 15 हजार रुपये
तलाक के फैसले को बरकरार रखने के साथ ही हाई कोर्ट ने पत्नी को मिलने वाले मासिक गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी की है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 10 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था, जिसे हाई कोर्ट ने बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया।अदालत ने दोनों पक्षों के हलफनामों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विचार करते हुए यह निर्णय लिया। साथ ही कहा कि भविष्य में परिस्थितियों में बदलाव होने पर कोई भी पक्ष सक्षम अदालत में गुजारा भत्ते की राशि में संशोधन के लिए आवेदन कर सकता है।
अदालत के फैसले में छिपा है एक मासूम की पीड़ा का पहलू
इस पूरे मामले में कानूनी लड़ाई पति-पत्नी के बीच थी, लेकिन सबसे संवेदनशील पहलू उस बच्ची का था, जो अपनी जिंदगी की शुरुआत में ही कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। जिस उम्र में बच्चे को माता-पिता के स्नेह, देखभाल और सुरक्षा की सबसे अधिक जरूरत होती है, उसी समय परिवार के रिश्तों में दूरी आ गई।
हाई कोर्ट के फैसले ने वैवाहिक क्रूरता और परित्याग के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया है। साथ ही पत्नी के गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी कर यह भी स्पष्ट किया कि तलाक के बावजूद उसके आर्थिक अधिकारों पर अलग से विचार किया जाना जरूरी है।












