Chaturmas 2026: चार महीने बदलें खान-पान, जानें सावन से कार्तिक तक क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज

Chaturmas Food Rules 2026: चातुर्मास 2026 शुरू होते ही धार्मिक अनुष्ठानों, व्रत और साधना का दौर तेज हो गया है। ये चार महीने भले ही शुभ कार्य नहीं होते हैं, लेकिन कई मायनों में इन महीनों में किये गये कार्य काफी पावन माने जाते हैं। हालांकि चातुर्मास की परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं। इस दौरान खान-पान में भी कई तरह के बदलाव किए जाते हैं। आयुर्वेद में भी मौसम के अनुसार भोजन में बदलाव को महत्वपूर्ण माना गया है।
मानसून के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने के साथ पाचन तंत्र पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन लेने की सलाह दी जाती है। चातुर्मास में अलग-अलग महीनों में कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने की परंपरा भी इसी मौसम चक्र से जुड़ी मानी जाती है।
मानसून में क्यों बदल जाता है खान-पान?
वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और कई खाद्य पदार्थ जल्दी खराब हो सकते हैं। इस मौसम में पाचन क्षमता प्रभावित होने की बात आयुर्वेद में कही गई है। इसलिए तले-भुने, बहुत अधिक मसालेदार और भारी भोजन से बचने तथा हल्के और गर्म भोजन को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है।
आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, इस मौसम में शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो सकती है। ऐसे में भोजन की मात्रा और उसकी प्रकृति पर ध्यान देना जरूरी है। पुराने अनाज, हल्का भोजन और उचित मात्रा में गर्म खाद्य पदार्थ लेना लाभकारी माना जाता है।
आयुर्वेद के अनुसार क्या खाना चाहिए?
वर्षा ऋतु में वात दोष बढ़ने और जठराग्नि कमजोर होने की बात आयुर्वेद में कही गई है। इसलिए भोजन में संतुलित मात्रा में स्निग्ध और गर्म प्रकृति के पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। पुराने जौ और गेहूं का सेवन भी उपयोगी माना जाता है।
इस दौरान हल्का व्यायाम करना, ताजा भोजन करना और स्वच्छ पानी पीना जरूरी है। बहुत ठंडे खाद्य पदार्थ, अत्यधिक भोजन और भोजन के तुरंत बाद आराम करने जैसी आदतों से बचना बेहतर माना जाता है।
चातुर्मास में हर महीने बदलता है खान-पान का नियम
चातुर्मास के दौरान प्रत्येक महीने कुछ खास खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने की परंपरा रही है। जानिए किस महीने में किन चीजों का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है।
सावन: हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज
सावन (30 जुलाई से 28 अगस्त 2026): सावन के दौरान हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज करने की परंपरा है। बारिश के मौसम में नमी अधिक होने के कारण पालक, मेथी और दूसरी पत्तेदार सब्जियों में मिट्टी, कीड़े और सूक्ष्मजीवों का जोखिम बढ़ सकता है।इसलिए इस मौसम में पत्तेदार सब्जियों को अच्छी तरह साफ करके और पर्याप्त पकाकर खाना जरूरी है। धार्मिक मान्यता के तहत इस महीने इन्हें छोड़ने की परंपरा भी प्रचलित है।
भाद्रपद: दही से दूरी
भाद्रपद (29 अगस्त से 26 सितंबर 2026): चातुर्मास के दूसरे महीने में दही का सेवन सीमित करने या छोड़ने की परंपरा है। आयुर्वेद में दही को गुरु और कफ बढ़ाने वाला माना गया है।
जिन लोगों को दही खाने से अपच या अन्य परेशानी होती है, उन्हें इस मौसम में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
आश्विन: दूध का सीमित सेवन
आश्विन (27 सितंबर से 26 अक्टूबर 2026): इस महीने में दूध के सेवन को लेकर संयम बरतने की परंपरा है। दूध कई लोगों के लिए पौष्टिक है, लेकिन कुछ लोगों को मौसम बदलने के दौरान भारी भोजन या डेयरी उत्पाद पचाने में परेशानी हो सकती है।इसलिए अपनी पाचन क्षमता के अनुसार दूध का सेवन करना बेहतर माना जाता है।
कार्तिक: दालों का सेवन कम करने की परंपरा
कार्तिक (27 अक्टूबर से 24 नवंबर 2026): चातुर्मास के अंतिम चरण में दालों का सेवन कम करने की परंपरा बताई जाती है। आयुर्वेदिक दृष्टि से कुछ दालें गैस और वात संबंधी परेशानी बढ़ा सकती हैं।
हालांकि दालें प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, इसलिए किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य या चिकित्सकीय कारणों से दाल खाने की आवश्यकता हो तो बिना विशेषज्ञ की सलाह के पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए।
चातुर्मास में इन बातों का भी रखें ध्यान
• ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन करें।
• बहुत अधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन कम करें।
• बासी भोजन खाने से बचें।
• भोजन साफ-सफाई के साथ तैयार करें।
• अपनी पाचन क्षमता के अनुसार भोजन करें।
• अत्यधिक उपवास या भोजन में अचानक बड़े बदलाव से बचें।
• किसी बीमारी या विशेष डाइट की स्थिति में डॉक्टर या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह लें।
नोट: चातुर्मास के खान-पान से जुड़े नियम धार्मिक परंपराओं और आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित हैं। किसी खाद्य पदार्थ को पूरी तरह बंद करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।










