Dussehra 2026: दशहरे पर क्यों बांटे जाते हैं आपटा के पत्ते? क्यों कहा जाता है पत्तों को सोना, दशहरा पर शमी पेड़ की पूजा का क्या है महत्व, जानिये शमी पूजा से जुड़ी है पांडवों की खास कथा
दशहरे पर शमी पूजा क्यों होती है? जानें पांडवों की कथा, महाराष्ट्र में आपटा के पत्तों को सोना कहने की मान्यता, शस्त्र पूजन और मां अपराजिता की पूजा का महत्व।

Dushhara Shami Puja । दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। दशहरा पूजा के दिन कई अहम पूजा होगी, जिसका पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। पुरातन काल से इस दिन रावण दहन के साथ शमी वृक्ष की पूजा, शस्त्र पूजन और मां अपराजिता की आराधना की भी परंपरा है।
वहीं, दशहरे पर आपटा के पत्ते एक-दूसरे को देने का खास रिवाज है। इन पत्तों को सोने का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शमी पूजा का संबंध महाभारत में पांडवों के अज्ञातवास की कथा से भी जुड़ा है। आइए जानते हैं दशहरे पर निभाई जाने वाली इन परंपराओं का महत्व।
शमी पूजा से जुड़ी है पांडवों की कथा
दशहरे पर शमी के पेड़ की पूजा करने के पीछे महाभारत से जुड़ी एक मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ में छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने पर अर्जुन ने इसी पेड़ से अपने शस्त्र वापस निकाले थे।
इसी कथा के कारण शमी वृक्ष को विजय, साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी के दिन शमी की पूजा करके लोग जीवन में सफलता, सुख-समृद्धि और बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं।
दशहरे पर आपटा के पत्तों को सोना क्यों कहते हैं?
महाराष्ट्र में विजयादशमी के अवसर पर आपटा के पत्ते बांटने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। लोग इन पत्तों को अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों को देकर शुभकामनाएं देते हैं। इन्हें प्रतीकात्मक रूप से सोना कहा जाता है।धार्मिक और लोक मान्यताओं में इन पत्तों को सौभाग्य, समृद्धि और खुशहाली से जोड़ा जाता है। इस परंपरा के जरिए लोग एक-दूसरे के जीवन में सुख, शांति और तरक्की की कामना करते हैं।
दशहरे पर शस्त्रों की पूजा क्यों की जाती है?
विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। पहले राजा और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते थे। आज भी कई जगहों पर इस दिन शस्त्रों की सफाई कर उन पर तिलक लगाया जाता है और पूजा की जाती है।इस परंपरा को शक्ति, साहस, सुरक्षा और कर्तव्य के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन करना भी जरूरी है।
मां अपराजिता की पूजा का क्या है महत्व?
विजयादशमी पर मां अपराजिता की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं में मां अपराजिता को विजय और सफलता से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन शुभ समय में उनकी पूजा करके लोग अपने कार्यों में सफलता और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना करते हैं।अलग-अलग क्षेत्रों में अपराजिता पूजन की विधि और समय में अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करते समय स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपराओं का ध्यान रखा जाता है।
किताबों, कलम और औजारों की भी होती है पूजा
दशहरे पर कई परिवारों में पढ़ाई और कामकाज से जुड़ी वस्तुओं की पूजा की जाती है। विद्यार्थी अपनी किताबें और कलम रखते हैं, जबकि कारीगर अपने औजारों की पूजा करते हैं।दक्षिण भारत में आयुध पूजा के दौरान मशीनों, वाहनों और दूसरे कामकाजी उपकरणों की पूजा करने की परंपरा है। इसका उद्देश्य उन साधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है, जिनसे आजीविका चलती है और जीवन आगे बढ़ता है।
दशहरे पर कैसे करें शमी पूजा?
विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष के पास स्वच्छता का ध्यान रखते हुए दीपक जलाकर पूजा की जा सकती है। इसके बाद फूल और अक्षत अर्पित कर सुख-समृद्धि और सफलता की कामना की जाती है।
शमी पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:
1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. शमी वृक्ष के पास स्वच्छ स्थान पर खड़े होकर श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
3. फूल, अक्षत और अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें।
4. दीपक जलाकर सुख-समृद्धि और सफलता की प्रार्थना करें।
5. पूजा के बाद परिवार के सदस्यों और परिचितों को विजयादशमी की शुभकामनाएं दें।
दशहरे का संदेश केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। शमी पूजा, शस्त्र पूजन और आपटा के पत्ते बांटने जैसी परंपराएं विजय, सद्भाव, कर्तव्य और समृद्धि की कामना से जुड़ी हैं। यही वजह है कि विजयादशमी का पर्व धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।












