गजब है TDPL बनने की कहानी: 21 साल पहले दारोगा की भर्ती में हुआ फेल, फिर रामबीर ने ऐसे तैयार की भ्रष्ट अफसरों को बनाने की कंपनी
2005 में दारोगा भर्ती परीक्षा देने वाले रामबीर सिंह की कंपनी TDPL अब JPSC-JSSC परीक्षा गड़बड़ी की जांच में चर्चा में है। जानिए पूरी कहानी।

रांची। सरकारी नौकरी की परीक्षा में बैठने वाला एक अभ्यर्थी कभी खुद दारोगा बनने का सपना देख रहा था। ये साल था 2005। उसने उत्तर प्रदेश में दारोगा भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा भी पास की, लेकिन अंतिम चयन की मंजिल तक नहीं पहुंच सका। कहानी यहीं खत्म हो जाती तो यह किसी आम अभ्यर्थी की कहानी होती।लेकिन करीब पांच साल बाद इसी व्यक्ति ने एक कंपनी खड़ी की और फिर कहानी का रास्ता बदलता चला गया।
यह नाम है रामबीर सिंह, जो TDPL के शुरुआती निदेशकों में शामिल रहा। आज जांच एजेंसियों की पड़ताल में इसी कंपनी का नाम JPSC-JSSC की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी, तकनीकी सिस्टम और अभ्यर्थियों को अवैध लाभ पहुंचाने के आरोपों से जोड़ा जा रहा है।यानी कहानी सिर्फ एक कंपनी की नहीं है। सवाल यह है कि जो व्यक्ति कभी खुद सरकारी नौकरी की परीक्षा में उतर चुका था, उसकी कंपनी आखिर सरकारी परीक्षाओं के उस सिस्टम तक कैसे पहुंची, जहां हजारों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा था?
2005 में दारोगा बनने की कोशिश, लेकिन अंतिम चयन नहीं
CID की जांच में सामने आई जानकारी के मुताबिक रामबीर सिंह ने 2005 में उत्तर प्रदेश दारोगा भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा पास की थी, लेकिन वह अंतिम चयन में सफल नहीं हो सका।सरकारी नौकरी की उस कोशिश के कुछ साल बाद उसने अपनी दिशा बदली।
2010 में TDPL की शुरुआत हुई।
शुरुआत में कंपनी का काम डेटा प्रोसेसिंग और तकनीकी सेवाओं से जुड़ा था। कंपनी के शुरुआती निदेशकों में रामबीर सिंह के साथ तारिक और सत्यपाल सिंह के नाम सामने आते हैं।उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि डेटा और तकनीक से जुड़ी यह कंपनी आने वाले वर्षों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं के विवाद में चर्चा का बड़ा हिस्सा बन जाएगी।
फिर आया अब्दुल… नहीं, अभय तिवारी वाला कनेक्शन
कहानी में असली मोड़ 2022-23 के आसपास आता है।CID के मुताबिक दिल्ली में एक मुलाकात के दौरान रामबीर सिंह की पहचान लालू प्रसाद, मुरैना सांसद के जरिए अभय तिवारी से हुई।जांच एजेंसी का दावा है कि इसके बाद TDPL को JPSC से जुड़े काम मिलने लगे और परीक्षा संचालन से जुड़ी उसकी भूमिका बढ़ती चली गई।
यहीं से कहानी सिर्फ टेक्निकल कंपनी की नहीं रह जाती।क्योंकि जिस सिस्टम के पास अभ्यर्थियों का डेटा, आवेदन, एडमिट कार्ड, परीक्षा केंद्र और रिजल्ट से जुड़ी संवेदनशील जानकारी होती है, वहां छोटी-सी तकनीकी पहुंच भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
एक तरफ दारोगा बनने का सपना, दूसरी तरफ परीक्षा सिस्टम तक पहुंच
यही इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प और असहज करने वाला पहलू है।2005 में रामबीर खुद दारोगा भर्ती परीक्षा का अभ्यर्थी था।2010 में उसने कंपनी बनाई। और बाद के वर्षों में उसकी कंपनी सरकारी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े तकनीकी काम तक पहुंच गई।
CID अब जिस कथित नेटवर्क की जांच कर रही है, उसमें सवाल यही है कि परीक्षा कराने वाली तकनीकी व्यवस्था के भीतर किस स्तर तक पहुंच बनाई गई और उस पहुंच का इस्तेमाल किस तरह हुआ?जांच एजेंसी का आरोप है कि नेटवर्क के जरिए अभ्यर्थियों से पैसे लेकर उन्हें कथित तौर पर अवैध लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगी।
तकनीकी कड़ी में मोहम्मद उस्मान का नाम
जांच में एक और नाम सामने आता है—मोहम्मद उस्मान।
उस्मान ने 2009 में ग्रेजुएशन किया था और 2010 से 2016 तक तकनीकी क्षेत्र में काम किया। इसके बाद उसने 2017 में पिकार टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड शुरू की।CID के मुताबिक 2020 में हेमंत कुमार वर्मा के जरिए उसकी पहचान रामबीर सिंह से हुई। इसके बाद तकनीकी काम का सिलसिला आगे बढ़ा।
जांच एजेंसी के अनुसार बाद में रामबीर ने उससे झारखंड की परीक्षाओं से जुड़े तकनीकी सेटअप को लेकर संपर्क किया।यहीं से जांच का फोकस इस सवाल पर भी है कि परीक्षा के तकनीकी सिस्टम में कौन-कौन लोग जुड़े थे और किसके पास क्या एक्सेस था?
2025 में ब्लैकलिस्ट, फिर भी काम कैसे मिला?
मामले को और गंभीर बनाने वाला एक सवाल 2025 से जुड़ा है।रिपोर्टों के मुताबिक JSSC ने मई 2025 में TDPL को समझौते की शर्तों के कथित उल्लंघन को लेकर ब्लैकलिस्ट किया था।अगर कंपनी पर कार्रवाई हुई थी, तो फिर उसके बाद परीक्षा से जुड़े काम में उसकी भूमिका कैसे बनी रही?
यही सवाल अब जांच के घेरे में है।
क्योंकि सरकारी परीक्षा में एजेंसी सिर्फ एक ठेकेदार नहीं होती। उसके पास अभ्यर्थियों से जुड़ा बड़ा डेटा और परीक्षा की तकनीकी प्रक्रिया होती है।
दारोगा नहीं बन पाया, लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी
रामबीर सिंह की कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट शायद यही है।
2005 — दारोगा बनने की कोशिश।
2010 — TDPL की शुरुआत।
2020 — तकनीकी नेटवर्क का विस्तार।
2022-23 — JPSC से जुड़े लोगों तक पहुंच।
2023 — परीक्षा संबंधी काम में कंपनी की भूमिका।
2025 — ब्लैकलिस्ट किए जाने का मामला।
2026 — JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी की जांच।
एक अभ्यर्थी से कंपनी संचालक तक का यह सफर अब जांच एजेंसियों की नजर में है।
असली सवाल अब यही है…
क्या यह महज एक ऐसी कंपनी की कहानी है, जिसने समय के साथ अपना कारोबार बढ़ाया?
या फिर सरकारी परीक्षाओं के तकनीकी सिस्टम तक पहुंच बनाने के बाद इसी नेटवर्क का इस्तेमाल कथित तौर पर अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया?












