Jitiya Vrat 2026: अन्न तो दूर, पानी की भी एक बूंद नहीं… कल नहाय खाय शुरू होगा महिलाओं का सबसे कठिन व्रत, कब रखा जाएगा 24 घंटे का निर्जला जितिया व्रत?
Jitiya Vrat 2026 Date & Time: संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत इस साल 3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। जानें नहाय-खाय, सरगही, अष्टमी तिथि और पारण का सही समय व नियम।

Jitiya Vrat 2026: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से माताएं हर साल जितिया व्रत रखती हैं। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत और जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। खास बात यह है कि यह सामान्य उपवास नहीं, बल्कि परंपरागत रूप से निर्जला व्रत होता है, जिसमें व्रती महिलाएं अन्न के साथ जल का भी त्याग करती हैं।
यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, दूसरे दिन मुख्य निर्जला व्रत रखा जाता है और तीसरे दिन पारण के साथ व्रत पूरा होता है। साल 2026 में जितिया का मुख्य व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा।
2026 में कब है जितिया व्रत?
इस साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के आधार पर जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा।
• नहाय-खाय: 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
• मुख्य निर्जला व्रत: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
• पारण: 4 अक्टूबर 2026, रविवार
• अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे
• अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर सुबह 5:51 बजे
उदया तिथि के अनुसार 3 अक्टूबर को जितिया व्रत रखा जाएगा।
अन्न तो दूर, पानी की भी एक बूंद नहीं
जितिया व्रत की सबसे खास परंपरा इसका निर्जला स्वरूप है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मुख्य व्रत के दौरान महिलाएं अन्न और जल दोनों का सेवन नहीं करती हैं। संतान की लंबी उम्र और मंगलमय जीवन की कामना से पूरे दिन संयम और पूजा-पाठ के साथ व्रत रखा जाता है।हालांकि, स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखना भी जरूरी है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं या किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को निर्जला उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
पहले दिन होता है नहाय-खाय
जितिया पर्व की शुरुआत 2 अक्टूबर को नहाय-खाय से होगी। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं।परंपरा के अनुसार इस दिन नोनी का साग, मरुआ यानी रागी की रोटी, तोरई और झिंगुनी की सब्जी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए और खाए जाते हैं।इसके बाद 3 अक्टूबर को सूर्योदय से पहले सरगही या ओठगन की परंपरा होती है। इसमें व्रती महिलाएं फल या मीठा भोजन ग्रहण कर पानी पीती हैं। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
दूसरे दिन होती है मुख्य पूजा
3 अक्टूबर को मुख्य जितिया व्रत रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं। शाम के समय सूर्यदेव, भगवान नारायण और राजा जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसी दौरान जितिया व्रत की कथा का पाठ भी किया जाता है।धार्मिक मान्यता में राजा जीमूतवाहन की कथा को इस व्रत से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।
4 अक्टूबर को होगा पारण
तीसरे दिन यानी 4 अक्टूबर को व्रत का पारण किया जाएगा। अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद व्रती महिलाएं स्नान कर सूर्यदेव को जल अर्पित करती हैं और इसके बाद व्रत खोलती हैं।पारण में जितिया का प्रसाद, अंकुरित चना और जल ग्रहण करने की परंपरा बताई जाती है। इसके बाद सात्विक भोजन किया जाता है।
बिहार-झारखंड समेत इन क्षेत्रों में विशेष मान्यता
जितिया व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों यानी पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाया जाता है। नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी इस पर्व की खास मान्यता है।मैथिली, भोजपुरी और थारू भाषी समुदायों में जितिया पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। नेपाल में इसे जितिया पावनी के नाम से भी जाना जाता है।
संतान की लंबी उम्र की कामना से रखा जाता है व्रत
जितिया व्रत के पीछे मुख्य धार्मिक भावना संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से जुड़ी है। तीन दिनों तक चलने वाली इस परंपरा में नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास और फिर पारण तक अलग-अलग धार्मिक रीति-रिवाज निभाए जाते हैं।












