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…जब स्वर्ग से लौट आयी डफली: जिस बेटी को मरा समझकर कर दिया था अंतिम संस्कार, वो 7 साल बाद दरवाजे पर खड़ी मिली जिंदा… मां की आंखों से छलक पड़े आंसू

लोहरदगा में 7 साल पहले लापता हुई डफली उरांव को परिवार ने अज्ञात शव के कपड़ों के आधार पर मृत मानकर अंतिम संस्कार कर दिया था। अब डफली जिंदा घर लौटी तो मां-बेटे की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

लोहरदगा। सात साल पहले जिस बेटी के लौटने की उम्मीद परिवार ने छोड़ दी थी, जिसके नाम पर आंसू बहाए गए और एक अज्ञात शव को उसका मानकर अंतिम संस्कार तक कर दिया गया था, वही बेटी शुक्रवार को अचानक घर के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई। सामने खड़ी डफली उरांव को देखकर उसकी मां और भाई कुछ पल के लिए जैसे पत्थर बन गए। फिर पहचान की पुष्टि हुई तो मां की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।जिस बेटी को परिवार सात साल से मृत मानकर जी रहा था, वह जिंदा लौट आई थी। ये कहानी है झारखंड के लोहरदगा की।

2019 में अचानक घर से गायब हुई थी डफली

लोहरदगा सदर थाना क्षेत्र के कुटमू निवासी स्वर्गीय सुकरा उरांव की करीब 42 वर्षीय बेटी डफली उरांव वर्ष 2019 में अचानक घर से लापता हो गई थी। परिजनों के अनुसार उस समय डफली मानसिक रूप से बीमार थी।

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परिवार ने उसे खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रिश्तेदारों से लेकर परिचितों और आसपास के इलाकों तक तलाश की गई, लेकिन डफली का कहीं पता नहीं चला। समय बीतता गया और परिवार की उम्मीद धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई।फिर एक दिन ऐसी खबर आई, जिसने पूरे परिवार को तोड़ दिया।

अज्ञात महिला का शव मिला और खत्म हो गई उम्मीद

परिजनों को जानकारी मिली कि कुडू थाना क्षेत्र में एक अज्ञात महिला का शव मिला है। शव की हालत ऐसी थी कि उसकी पहचान करना मुश्किल था।पुलिस की ओर से परिजनों को महिला के कपड़े दिखाए गए। कपड़े डफली के कपड़ों से मिलते-जुलते थे। परिवार ने कपड़ों के आधार पर महिला की पहचान डफली के रूप में कर ली।इसके बाद परिवार ने अपनी बेटी को मृत मान लिया।

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अंतिम संस्कार कर दिया गया।

जिस बेटी के लौटने का इंतजार था, उसकी यादों के साथ परिवार ने जिंदगी आगे बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन शायद कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

सात साल बाद अचानक लौटी बेटी

परिवार को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि डफली कहीं और जिंदगी जी रही है।इसी बीच डफली ओडिशा के खुर्दा स्थित मिशन आसरा के संपर्क में आई। बाद में उनकी देखभाल और उपचार की जिम्मेदारी महाराष्ट्र की श्रद्धावन रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन ने संभाली।देखभाल के दौरान डफली ने अपने घर का पता लोहरदगा के कुटमू का बताया।संस्था के सदस्यों ने जब पते का सत्यापन कराया तो जानकारी सही निकली।और फिर आया वह दिन, जिसकी कल्पना परिवार ने सात साल से नहीं की थी।

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दरवाजे पर बेटी को देखकर मां रह गईं स्तब्ध

शुक्रवार को संस्था के सदस्य डफली को लेकर कुटमू पहुंचे। जब परिवार के सामने डफली आई तो कुछ देर के लिए किसी को विश्वास ही नहीं हुआ।जिस बेटी का अंतिम संस्कार सात साल पहले किया जा चुका था, वह सामने जिंदा खड़ी थी।

पहचान की पुष्टि हुई तो मां की आंखों से आंसू बहने लगे। भाई भी भावुक हो उठा। घर का माहौल अचानक मातम से खुशियों में बदल गया।आसपास के लोगों को जब यह खबर मिली तो वे भी डफली को देखने पहुंचने लगे।

सात साल का इंतजार… और एक पल में बदल गई पूरी कहानी

एक मां जिसने सात साल पहले अपनी बेटी को खो दिया था, उसने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वही बेटी अचानक उसके सामने आकर खड़ी हो जाएगी।परिवार ने जिस शव का अंतिम संस्कार अपनी बेटी का समझकर किया था, वह डफली नहीं थी। डफली सात साल तक परिवार से दूर रही और आखिरकार अपने घर का पता याद रखते हुए वापस अपनों तक पहुंच गई।

यह कहानी सिर्फ बिछड़ने और मिलने की नहीं है। यह उस मां के आंसुओं की कहानी है, जिसने बेटी को खोया समझकर जिंदगी गुजारी और सात साल बाद उसे अपनी आंखों के सामने जीवित देखा।

अज्ञात शवों की पहचान की प्रक्रिया पर भी सवाल

डफली के वापस लौटने की इस घटना ने अज्ञात शवों की पहचान की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार का कहना है कि यदि उस समय शव की पहचान की पुख्ता पुष्टि होती, तो शायद उन्हें सात वर्षों तक इस गलतफहमी में नहीं रहना पड़ता।फिलहाल डफली के घर लौटने से परिवार में खुशी है।

सात साल पहले जिस घर में बेटी की मौत का मातम पसरा था, उसी घर में अब उसके लौटने की खुशी है।जिस बेटी को परिवार ने खो दिया था, उसका इंतजार खत्म हुआ… लेकिन इस बार मौत नहीं, जिंदगी दरवाजे पर खड़ी थी।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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