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“1500 रुपये दो, तभी बनेगा सर्टिफिकेट” सदर अस्पताल में घूसखोरी का खेल, शिकायत लेकर पहुंची जिपं सदस्य और सिविल सर्जन में नोंकझोंक…

“Pay ₹1,500, or No Certificate”: The Racket of Bribery at Sadar Hospital—A Heated Altercation Ensues Between a Zila Parishad Member and the Civil Surgeon Over Complaints.

धनबाद/17.4.26। धनबाद के सिविल सर्जन कार्यालय में जो सामने आया है, वह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि सिस्टम की सड़ांध का खुला सबूत है। नवोदय और एकलव्य स्कूलों में दाखिले के लिए जरूरी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के नाम पर गरीब आदिवासी बच्चों से 1500 रुपये तक की कथित वसूली ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। नवोदय और एकलव्य विद्यालयों में प्रवेश के लिए जरूरी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के बदले कथित रूप से 1500 रुपये घूस मांगने की शिकायत के बाद गुरुवार को ग्रामीणों ने जमकर विरोध-प्रदर्शन किया।

अभी सदर अस्पताल में कमिशनखोरी का मामला थमा भी नहीं था कि सिविल सर्जन कार्यालय में भ्रष्ट्राचार कि पोल खोल दी। ऐसा नहीं है कि ये मामला पहली बार सामने आया है। इसी मेडिकल सर्टिफिकेट के नाम पर घूसखोरी मामले में इस कार्यालय में ACB ने एक कर्मी को रंगे हाथ दबोचा था। कभी चौकीदार अभ्यर्थी के मेडिकल सर्टिफिकेट में हंगामा जैसे कई मामले सामने आ चुके है।परंतु हर बार मामले को दबाने और लीपापोती होती रहती है।

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परंतु इसबार मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि आदिवासी राज्य में आदिवासी के उन मासूम बच्चों के सपनों को कुचलने का है, जो बेहतर शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों से आए ये बच्चे पिछले पांच दिनों से सिविल सर्जन कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनका मेडिकल टेस्ट तक नहीं किया गया। आरोप साफ है—“पैसा दो, तभी सर्टिफिकेट मिलेगा।”

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ग्रामीणों का आरोप है कि कई बच्चे पिछले पांच दिनों से सिविल सर्जन कार्यालय आ-जा रहे हैं, लेकिन अब तक उनका मेडिकल परीक्षण तक नहीं किया गया है। परिजनों का कहना है कि बिना पैसे दिए सर्टिफिकेट नहीं बनाया जा रहा, जिससे बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि गरीब आदिवासी परिवारों से 1500 रुपये की मांग की जा रही है। यह रकम कई परिवारों के लिए बड़ी है, जिससे वे असहाय महसूस कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह न केवल भ्रष्टाचार है, बल्कि गरीब और प्रतिभाशाली बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है।

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सिस्टम बना ‘रिश्वतखोरी का अड्डा’?

जब सरकारी दफ्तर ही दलाली का केंद्र बन जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है। जिन बच्चों को जवाहर नवोदय विद्यालय और एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल में दाखिला लेकर आगे बढ़ना था, उन्हें अब घूस के दलदल में धकेला जा रहा है। 20 अप्रैल की अंतिम तारीख सिर पर है, और बच्चे अब भी सर्टिफिकेट के इंतजार में हैं। अगर समय पर कागजात जमा नहीं हुए, तो उनका एडमिशन रुक जाएगा—और शायद उनका भविष्य भी।

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“आदिवासी हित” सिर्फ भाषणों तक सीमित?

मौके पर पहुंचे भाजपा नेता राजीव ओझा ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “सरकार आदिवासी हितों की बात करती है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि उन्हीं बच्चों को सबसे ज्यादा परेशान किया जा रहा है।”यह बयान सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि उस सच्चाई की झलक है जिसे हर कोई देख रहा है—गरीब और कमजोर वर्ग आज भी सिस्टम के सबसे आसान शिकार हैं।

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यहां देखे नोंकझोंक की video

प्रशासन की सफाई—या लीपापोती?

सिविल सर्जन डॉ आलोक विश्वकर्मा ने आरोपों को सीधे खारिज तो नहीं किया, लेकिन सफाई जरूर दी कि “प्रक्रिया जारी है” और “जल्द सर्टिफिकेट जारी होंगे।”लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ सही है, तो बच्चे पांच दिन से दर-दर क्यों भटक रहे हैं? आखिर मेडिकल टेस्ट क्यों नहीं हुआ? और सबसे बड़ा सवाल—क्या वाकई बिना पैसे काम हो रहा है?यह मामला प्रशासनिक लापरवाही से कहीं आगे बढ़ चुका है। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सीधे-सीधे गरीब आदिवासी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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