Jharkhand High Court: ट्रेन हादसे में मृत यात्री के परिवार को मिलेगा 8 लाख मुआवजा, कोर्ट ने कहा, यात्रा में मौत पर मुआवजा रेलवे की जिम्मेदारी, 9 साल बाद मिला इंसाफ
झारखंड हाईकोर्ट ने ट्रेन हादसे में मृत यात्री के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने 8 लाख रुपये मुआवजा और 7% ब्याज देने का आदेश दिया।

Jharkhand High Court Railway Compensation। टिकट लेकर यात्रा कर रहे किसी यात्री की चलती ट्रेन से गिरकर मौत होने पर रेलवे मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। झारखंड हाईकोर्ट ने ये महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि अदालत ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल द्वारा खारिज किए गए मुआवजा दावे को स्वीकार करते हुए मृतक के परिजनों को 8 लाख रुपये का मुआवजा और दुर्घटना की तारीख से सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि रेलवे अधिनियम के तहत इस तरह की घटना “अनटुवर्ड इंसीडेंट” की श्रेणी में आती है और ऐसे मामलों में कानून की भावना पीड़ित परिवार को राहत देने की है, न कि तकनीकी आधार पर उनके अधिकारों को नकारने की।
ट्रिब्यूनल से नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट पहुंचा परिवार
यह मामला देवघर जिले के मधुपुर निवासी अशोक मेहतो की मौत से जुड़ा है। उनकी पत्नी राजकुमारी देवी और चार बेटियों ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे की मांग की थी, लेकिन अप्रैल 2023 में ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उपलब्ध तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि यह रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे योग्य घटना थी।ट्रिब्यूनल के इस फैसले के खिलाफ परिवार ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की, जहां पूरे मामले की दोबारा सुनवाई हुई।
वैध टिकट के साथ शुरू की थी यात्रा, लेकिन घर नहीं लौट सके
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, 1 अगस्त 2017 को अशोक मेहतो ने जमुई से मधुपुर तक का द्वितीय श्रेणी का टिकट खरीदकर दानापुर-टाटानगर एक्सप्रेस में सफर शुरू किया था। यात्रा के दौरान उन्होंने परिजनों से फोन पर बात कर घर लौटने की जानकारी भी दी थी।रात तक घर नहीं पहुंचने पर परिवार ने तलाश शुरू की।
बाद में सूचना मिली कि नवापटरी के पास रेलवे ट्रैक के समीप एक व्यक्ति का शव मिला है। मौके पर पहुंचने पर उसकी पहचान अशोक मेहतो के रूप में हुई।जीआरपी ने मामले में यूडी केस दर्ज किया। जांच, पंचनामा और अंतिम रिपोर्ट में मौत का कारण चलती ट्रेन से गिरना बताया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मृतक के पास से यात्रा का वैध रेल टिकट भी बरामद हुआ।
रेलवे की दलीलों को अदालत ने माना कमजोर
सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से कहा गया कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और शव ट्रैक से कुछ दूरी पर मिला था। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यात्री ट्रेन से गिरा था।हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि तेज रफ्तार ट्रेन से गिरने पर व्यक्ति का शरीर ट्रैक से कुछ दूरी पर जा सकता है।
ऐसे में केवल शव की स्थिति के आधार पर दुर्घटना की प्रकृति बदल नहीं जाती।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर रेल टिकट खरीदने का कोई प्रत्यक्षदर्शी होना आवश्यक नहीं है। यदि पुलिस जांच, बरामद टिकट और अन्य रिकॉर्ड किसी व्यक्ति के वैध यात्री होने की पुष्टि करते हैं, तो उसे संदेह के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
कानून का उद्देश्य पीड़ितों को राहत देना
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की मुआवजा संबंधी व्यवस्था एक कल्याणकारी कानून है। इसलिए इसकी व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जिससे पीड़ित परिवार को न्याय मिले, न कि तकनीकी कारणों से उसका अधिकार छीना जाए।अदालत ने माना कि यह मामला रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(सी)(2) और 124-ए के अंतर्गत “अनटुवर्ड इंसीडेंट” की श्रेणी में आता है।
दो महीने के भीतर करना होगा भुगतान
हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त करते हुए पूर्व रेलवे को निर्देश दिया कि मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही 1 अगस्त 2017 से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा किया जाए। अदालत ने यह पूरी राशि दो महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला उन हजारों रेल यात्रियों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके मुआवजा दावे केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर खारिज कर दिए जाते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करते हैं कि मृतक वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था और दुर्घटना ट्रेन से गिरने के कारण हुई, तो रेलवे अपनी कानूनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।








