Jharkhand High Court: निर्मल महतो हत्याकांड के दोषी क्या समय पूर्व मिलेगी रिहाई ? हाईकोर्ट ने दिया बोर्ड को तीन महीने का वक्त..
झारखंड हाईकोर्ट ने निर्मल महतो हत्याकांड के दोषी नरेंद्र सिंह दीक्षित की समय-पूर्व रिहाई पर राज्य सजा समीक्षा बोर्ड का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने 2011 की नीति के तहत तीन महीने में नया निर्णय लेने का निर्देश दिया।

Nirmal Mahato Murder Case: झारखंड हाईकोर्ट ने झामुमो नेता निर्मल महतो हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे नरेंद्र सिंह दीक्षित की समय-पूर्व रिहाई (Premature Release) पर हाईकोर्ट का आदेश आया है। हाईकोर्ट ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के फैसले को निरस्त कर दिया है। अदालत ने बोर्ड को 2011 की नीति के अनुरूप तीन महीने के भीतर मामले पर दोबारा फैसला लेने का निर्देश दिया है।
गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट ने झामुमो के दिवंगत नेता निर्मल महतो हत्याकांड के दोषी नरेंद्र सिंह दीक्षित की समय-पूर्व रिहाई (प्रीमैच्योर रिलीज) से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के जस्टिस आर. मुखोपाध्याय की अदालत ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा 28 मार्च 2025 को पारित आदेश को निरस्त करते हुए बोर्ड को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की 26 मई 2011 की समय-पूर्व रिहाई नीति के प्रावधानों के अनुरूप तीन महीने के भीतर नया निर्णय लिया जाए।
29 वर्ष की सजा पूरी कर चुका है दोषी
नरेंद्र सिंह दीक्षित हत्या और आर्म्स एक्ट के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। उसने वास्तविक रूप से करीब 23 वर्ष जेल में बिताए हैं, जबकि रिमिशन (छूट) सहित उसकी कुल सजा अवधि लगभग 29 वर्ष पूरी हो चुकी है।वर्ष 2017 में झारखंड हाईकोर्ट ने उसकी सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार को समय-पूर्व रिहाई की नीति के तहत दो महीने के भीतर उसके मामले पर विचार करने का निर्देश दिया था।
बोर्ड ने राजनीतिक हत्या का हवाला देकर खारिज की थी अर्जी
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने मामले की समीक्षा की थी। बोर्ड ने यह कहते हुए नरेंद्र सिंह दीक्षित की समय-पूर्व रिहाई की अर्जी खारिज कर दी थी कि उसने राजनीतिक कारणों से एक लोकप्रिय जनप्रतिनिधि की सुनियोजित हत्या की थी और उसकी रिहाई से समाज में गलत संदेश जाएगा।
हाईकोर्ट ने बोर्ड की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने प्रोबेशन अधिकारी की सकारात्मक रिपोर्ट पर पर्याप्त विचार नहीं किया। साथ ही, 26 मई 2011 की सरकारी नीति में निर्धारित अनिवार्य मानकों का भी समुचित पालन नहीं किया गया।अदालत ने कहा कि समय-पूर्व रिहाई पर निर्णय लेते समय केवल अपराध की प्रकृति को आधार नहीं बनाया जा सकता। बोर्ड को यह भी देखना चाहिए कि—
• अपराध का समाज पर कितना प्रभाव पड़ा।
• भविष्य में दोषी के दोबारा अपराध करने की कितनी संभावना है।
• दोषी को आगे जेल में रखना कितना आवश्यक है।
• उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियां क्या हैं।
तीन महीने में दोबारा फैसला लेने का निर्देश
जस्टिस आर. मुखोपाध्याय ने कहा कि बोर्ड ने दोषी द्वारा जेल में बिताई गई लंबी अवधि और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी करते हुए केवल हत्या के राजनीतिक पहलू को अधिक महत्व दिया, जो 2011 की नीति के अनुरूप नहीं है।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 28 मार्च 2025 के आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड को निर्देश दिया कि वह सरकार की समय-पूर्व रिहाई नीति के अनुसार पूरे मामले पर पुनर्विचार कर तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय ले।








