High Court: गजब फर्जीवाड़ा ! फर्जी सर्टिफिकेट, एक दिन ड्यूटी भी नहीं, फिर भी 18 साल से मांग रहा वेतन, जानिये फिर हाईकोर्ट ने क्या कहा…
हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई नियुक्ति से वेतन या सेवा लाभ का अधिकार नहीं मिलता। जानिए बक्सर निवासी कर्मचारी के मामले में कोर्ट का पूरा फैसला।

High Court Fake Appointment Case : फर्जी नौकरी मामले में हाईकोर्ट में अहम फैसला सुनाया है। आरोपी ने ना तो एक भी दिन नौकरी की, ज्वाइनिंग भी फर्जी दस्तावेज पर हुई, फिर भी 18 साल तक वेतन व अन्य लाभ की डिमांड करता रहा। अब हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई नियुक्ति से किसी कर्मचारी को वेतन या अन्य सेवा लाभ का अधिकार नहीं मिल सकता। अदालत ने बक्सर निवासी कमलेश कुमार की अपील खारिज करते हुए कहा कि कूटरचित नियुक्ति पत्र के आधार पर कोई कानूनी दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
फर्जी नियुक्ति पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई है, तो उसे वेतन, सेवा लाभ या किसी अन्य सरकारी सुविधा का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता। मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायाधीश सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बक्सर निवासी कमलेश कुमार की अपील खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता का वेतन संबंधी दावा एक कूटरचित (फर्जी) नियुक्ति पत्र पर आधारित है। ऐसी स्थिति में उसे किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।
2008 की जांच में फर्जी पाए गए थे सभी दस्तावेज
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि वर्ष 2008 में अदालत के निर्देश पर तत्कालीन प्रधान सचिव, मानव संसाधन विकास विभाग ने पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई थी।जांच के दौरान नियुक्ति पत्र, सेवा स्वीकृति, स्थानांतरण और वेतन भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच की गई। रिपोर्ट में इन सभी दस्तावेजों को फर्जी और कूटरचित पाया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि कमलेश कुमार कभी विधिवत विभागीय सेवा में शामिल ही नहीं हुए थे और उन्हें विभाग की ओर से कभी वेतन का भुगतान भी नहीं किया गया।
अभिलेखों में छेड़छाड़ की भी आशंका
जांच रिपोर्ट में विभागीय रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की संभावना जताई गई थी। साथ ही कुछ कर्मचारियों की संलिप्तता की आशंका भी व्यक्त की गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए विजिलेंस जांच कराने की भी अनुशंसा की गई थी।हाईकोर्ट ने कहा कि इतने वर्षों बाद उसी जांच रिपोर्ट के विपरीत वेतन की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
सिविल कोर्ट का फैसला भी नहीं आया काम
अपीलकर्ता ने अपनी दलील में एक सिविल कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए नियुक्ति पत्र को वैध बताया, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।खंडपीठ ने कहा कि सिविल कोर्ट का आदेश पहले से पारित हाईकोर्ट के आदेशों और प्रधान सचिव की जांच रिपोर्ट को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश और जांच के निष्कर्ष ही निर्णायक हैं।
18 साल तक नहीं दी चुनौती, रिपोर्ट को माना अंतिम
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता ने पिछले 18 वर्षों तक जांच रिपोर्ट को किसी भी मंच पर चुनौती नहीं दी। ऐसे में रिपोर्ट के निष्कर्ष अंतिम रूप से प्रभावी हो चुके हैं और अब उसके आधार पर वेतन या अन्य सेवा लाभ का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वैध नियुक्ति ही सेवा लाभ का आधार होती है। यदि नियुक्ति ही फर्जी दस्तावेजों पर आधारित हो, तो उससे कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।








