झारखंड: कर्मचारी के नियमितिकरण पर हाईकोर्ट का एक और आदेश, 25 साल प्रतिनियुक्ति पर काम कराया, अब नियमित करना होगा, 10 सप्ताह की मोहलत
झारखंड हाई कोर्ट ने समाज कल्याण विभाग में 25 वर्षों तक प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मचारी संतोष कुमार को नियमित करने और सभी सेवा व सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया है।

Jharkhand High Court Regularization Order। झारखंड हाई कोर्ट ने अनियमित कर्मचारी के नियमितिकरण पर एक और बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि 10 सप्ताह के भीतर कर्मचारी को नियमित कर रिटायरमेंट के सभी लाभ देने के निर्देश दिया है। दरअसल समाज कल्याण विभाग में करीब 25 वर्षों तक प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर काम करने वाले कर्मचारी संतोष कुमार की याचिका पर हाईकोर्ट ने ये आदेश दिया है।
अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उनके नियमितीकरण (समायोजन) की मांग ठुकरा दी गई थी।न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि संतोष कुमार की सेवा नियमित की जाए और उन्हें सेवा तथा सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभ दिए जाएं। कोर्ट ने यह प्रक्रिया आदेश की प्रति मिलने के 10 सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा है।
25 साल तक एक ही विभाग में किया काम
याचिका के अनुसार, संतोष कुमार की नियुक्ति वर्ष 1983 में छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव यूनियन में हुई थी। वर्ष 1997 में सरकार की नीति के तहत उन्हें प्रतिनियुक्ति पर समाज कल्याण विभाग भेजा गया। इसके बाद वे लगातार उसी विभाग में काम करते रहे, लेकिन उन्हें कभी नियमित नहीं किया गया।वर्ष 2022 में उन्हें 58 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त कर दिया गया, जबकि उनकी मूल संस्था में सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष निर्धारित थी।
कोर्ट ने सरकार की दलील नहीं मानी
राज्य सरकार ने नियमितीकरण से इनकार करते हुए विभागीय कार्रवाई और निलंबन का हवाला दिया था। लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को केवल मामूली सजा दी गई थी। यदि सरकार उनके काम से असंतुष्ट होती, तो उन्हें बहुत पहले ही मूल विभाग में वापस भेज देती। अदालत ने कहा कि सरकार ने उन्हें सेवानिवृत्ति तक उसी विभाग में काम करने दिया। इससे साफ है कि उनकी सेवाएं स्वीकार की गई थीं।
सेवा पुस्तिका पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सरकार ने यह भी कहा था कि संतोष कुमार की सेवा पुस्तिका अधूरी और सत्यापित नहीं थी। हालांकि कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद इस दावे को गलत पाया। अदालत ने कहा कि सेवा पुस्तिका विधिवत सत्यापित थी और निलंबन अवधि में भी उन्हें नियमानुसार निर्वाह भत्ता तथा बाद में वेतन दिया गया था। इसलिए उनकी सेवा में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं माना जा सकता।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी से लगभग 25 वर्षों तक लगातार एक ही विभाग में काम लिया जाता है और उसे मूल संस्था में वापस नहीं भेजा जाता, तो ऐसे मामले को केवल प्रतिनियुक्ति नहीं माना जा सकता, बल्कि यह नियमितीकरण का मामला बनता है।








