झारखंड हाईकोर्ट न्यूज : माध्यमिक आचार्य भर्ती पर हाईकोर्ट ने JSSC ने पूछा, गड़बड़ी में शामिल लोगों पर क्यों नहीं हुई FIR, अब 27 को होगी सुनवाई…
Jharkhand High Court News: On the Secondary Teacher Recruitment, the High Court asked JSSC, why no FIR was lodged against those involved in the irregularities, now the hearing will be held on 27th...

झारखंड में माध्यमिक आचार्य भर्ती विवाद में हाईकोर्ट ने JSSC के रवैये पर सवाल उठाये हैं। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि अब तक दोषियों पर FIR क्यों नहीं हुई। 2819 अभ्यर्थियों की पुनर्परीक्षा के आदेश को चुनौती दी गई है। मामले में अब 27 अप्रैल को सुनवाई होगी
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रांची। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की माध्यमिक आचार्य नियुक्ति परीक्षा-2025 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मामले में हाईकोर्ट ने आयोग के कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा है कि अब तक इस प्रकरण में शामिल दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) क्यों दर्ज नहीं की गई।
दरअसल यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब अभ्यर्थी अर्चना कुमारी सहित अन्य उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर JSSC द्वारा 23 अप्रैल 2026 को जारी नोटिस को चुनौती दी। इस नोटिस के माध्यम से आयोग ने कुल 2819 अभ्यर्थियों को 8 मई 2026 को प्रस्तावित पेपर-2 की पुनर्परीक्षा में शामिल होने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता चंचल जैन ने कहा कि आयोग का यह निर्णय पूरी तरह अवैध और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने तर्क दिया कि बिना यह सुनिश्चित किए कि परीक्षा केंद्रों पर अनियमितताओं में कौन-कौन शामिल थे, और किन अभ्यर्थियों ने अनुचित साधनों (unfair means) का उपयोग किया, सभी 2819 अभ्यर्थियों को एक साथ पुनर्परीक्षा के लिए बाध्य करना अनुचित है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे किसी भी प्रकार की गड़बड़ी में शामिल नहीं रहे हैं, फिर भी उन्हें दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में लाया जा रहा है। यह उनके अधिकारों का हनन है और इससे उन्हें अनावश्यक मानसिक और शैक्षणिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए आयोग से जवाब तलब किया है कि जब कथित अनियमितताओं की जानकारी है, तो अब तक संबंधित परीक्षा केंद्रों के अधिकृत व्यक्तियों और दोषी अभ्यर्थियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल सामूहिक रूप से सभी अभ्यर्थियों को पुनर्परीक्षा में शामिल करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आयोग को पहले जांच कर दोषियों को चिन्हित करना चाहिए था और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी, न कि सभी अभ्यर्थियों को एक ही दायरे में लाकर परेशान किया जाए।फिलहाल, इस मामले में अगली सुनवाई 27 अप्रैल को निर्धारित की गई है, जिसमें आयोग को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।









