Jharkhand High Court: ये विभाग तो कछुआ से भी सुस्त निकला, 39 साल तक नौकरी के बाद पता चला, ये तो फर्जी नियुक्ति है, बर्खास्तगी को हाईकोर्ट ने किया बहाल
Jharkhand High Court: CCL कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द, 39 साल सेवा के बाद रिटायरमेंट लाभ देने का आदेश,झारखंड हाईकोर्ट ने CCL के पूर्व कर्मचारी अभय कुमार की बर्खास्तगी रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि बिना गवाह और ठोस साक्ष्य के विभागीय जांच में दोषी ठहराना अवैध है। CCL को 12 सप्ताह में सभी रिटायरमेंट लाभ देने का आदेश।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने बर्खास्त कर्मचारी को राहत दे दी है। कोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर रिटायरमेंट का लाभ देने का निर्देश दिया है। ये मामला सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) के एक कर्मचारी से जुड़ा है। उन्होंने बड़ी राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विभागीय जांच के दौरान प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।
केवल दस्तावेजों के आधार पर, बिना किसी मौखिक गवाह और ठोस साक्ष्य के कर्मचारी को दोषी ठहराकर नौकरी से हटाना कानूनन सही नहीं माना जा सकता।हाईकोर्ट के इस फैसले को कर्मचारियों के अधिकारों और विभागीय जांच की निष्पक्ष प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश दोनों रद्द
झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने अभय कुमार की ओर से दायर याचिका स्वीकार करते हुए सीसीएल द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश और उसके खिलाफ पारित अपीलीय आदेश दोनों को निरस्त कर दिया।अदालत ने सीसीएल प्रबंधन को निर्देश दिया कि 12 सप्ताह के भीतर अभय कुमार को सभी सेवानिवृत्ति लाभ, वित्तीय देयक और अन्य बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
विभागीय जांच पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
इस मामले में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच एक अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) प्रक्रिया है, इसलिए इसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी दस्तावेज को रिकॉर्ड में रख देने से वह स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाता। उसकी सत्यता और प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए संबंधित व्यक्ति की मौखिक गवाही आवश्यक होती है।
अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ केवल कागजी दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की जाए और उन दस्तावेजों को साबित करने के लिए कोई गवाह पेश न किया जाए, तो ऐसी कार्रवाई निष्पक्ष जांच की कसौटी पर टिक नहीं सकती।
बिना गवाह के दोषी ठहराना अवैध
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में विभागीय जांच के दौरान सीसीएल प्रबंधन आरोपों को साबित करने के लिए एक भी मौखिक गवाह प्रस्तुत नहीं कर सका।इसके बावजूद जांच अधिकारी ने कर्मचारी को दोषी मानते हुए बर्खास्तगी की अनुशंसा कर दी। अदालत ने इसे पूरी तरह गैरकानूनी बताते हुए कहा कि जब आरोप विधिसम्मत तरीके से सिद्ध ही नहीं हुए, तब इतनी कठोर सजा देना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।
सेवानिवृत्ति से ठीक पहले हुई थी कार्रवाई
अदालत ने यह भी माना कि अभय कुमार दिसंबर 2021 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में अब उन्हें सेवा में बहाल करने का प्रश्न नहीं उठता। इसलिए कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए सीसीएल को उनके सभी रिटायरमेंट लाभ और बकाया भुगतान करने का निर्देश दिया।मामले के अनुसार अभय कुमार की नियुक्ति 19 जून 1980 को उनकी मां की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद अनुकंपा नियुक्ति के तहत सीसीएल की ढोरी कोलियरी में हुई थी।उन्होंने लगभग 39 वर्षों तक सेवा दी और इस दौरान उनके खिलाफ कोई गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई।
रिटायरमेंट से पहले लगा फर्जी नियुक्ति का आरोप
वर्ष 2019 में, जब उनकी सेवानिवृत्ति में कुछ ही समय बचा था, सीसीएल प्रबंधन ने एक शिकायत के आधार पर उन्हें चार्जशीट जारी की। आरोप लगाया गया कि उन्होंने स्वयं को जगदेव भुइयां का पुत्र बताकर गलत तरीके से अनुकंपा नियुक्ति हासिल की थी। इसी आरोप के आधार पर विभागीय जांच शुरू की गई।
18 बार हुई सुनवाई, फिर भी नहीं आया कोई गवाह
याचिका के अनुसार जांच अधिकारी ने इस मामले में 18 बैठकें आयोजित कीं, लेकिन सीसीएल प्रबंधन आरोपों को सिद्ध करने के लिए एक भी गवाह पेश नहीं कर पाया।इसके बावजूद दिसंबर 2021 में, सेवानिवृत्ति से ठीक पहले, अभय कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।









