झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 7 साल तक सहमति से बने संबंध ब्रेकअप के बाद ‘रेप’ नहीं, एफआईआर निरस्त
Jharkhand High Court quashes rape FIR on promise to marry after 7 years of relationship. Read judgment details on consent and breakup law.

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने प्रेम संबंध के बाद सहमति से बने शारीरिक संबंध पर बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के जस्टिस एके चौधरी की एकल पीठ ने शादी का झांसा देकर सात साल तक शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में दर्ज दुष्कर्म (Rape) के मुकदमे को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक अपनी मर्जी से संबंध में रहते हैं, तो रिश्ता टूटने या शादी न होने की स्थिति में इसे कानूनी रूप से ‘रेप’ नहीं माना जा सकता।
जानिये मामला क्या था? (गिरिडीह से जुड़ा केस)
यह पूरा मामला गिरिडीह के महिला (सदर) थाने से शुरू हुआ था, जहाँ एक महिला ने अभियुक्त लालू महथा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी:
- मुलाकात और रिश्ता: शिकायत के अनुसार, दोनों की मुलाकात 2016 में एक शादी समारोह के दौरान हुई थी, जिसके बाद उनके बीच प्रेम संबंध बना।
- 7 साल का संबंध: महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ लगभग 7 वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए।
- मोबाइल बंद और इनकार: दिसंबर 2022 में दोनों रांची के एक होटल में ठहरे थे, जिसके बाद आरोपी ने संबंध खत्म कर लिया और अप्रैल 2023 में अपना फोन बंद कर दिया। आरोपी व उसके परिवार द्वारा शादी से इनकार करने पर महिला ने एफआईआर दर्ज कराई।
- संज्ञान और हाईकोर्ट की शरण: पुलिस चार्जशीट के आधार पर गिरिडीह के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) ने 16 अगस्त 2024 को मामले में संज्ञान लिया था, जिसे चुनौती देने के लिए आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
झारखंड हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां: क्यों निरस्त हुआ केस?
सुनवाई के दौरान जस्टिस एके चौधरी की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों (Precedents) का हवाला देते हुए कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत रेखांकित किए:
- शुरुआत में नीयत खराब होने का सबूत नहीं: कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई स्पष्ट तथ्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही शादी करने की नहीं थी या उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया था।
- सहमति (Consent) सबसे बड़ा आधार: दोनों पक्ष बालिग थे और 7 वर्षों का लंबा समय यह दर्शाता है कि संबंध आपसी सहमति पर आधारित थे।
- ‘झूठे वादे’ की कानूनी परिभाषा: अदालत ने कहा कि “शादी का वादा पूरा न कर पाना” अपने आप में “झूठा वादा” (False Promise) नहीं माना जा सकता। वादा तभी झूठा माना जाएगा जब उसे करते समय ही तोड़ने की नीयत रही हो।
ब्रेकअप और कानून: सुप्रीम कोर्ट का भी यही रुख
यह फैसला भारतीय कानूनी व्यवस्था के उस सिद्धांत को और मजबूत करता है जिसे सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर दोहराता रहा है:
सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत: “दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों में अगर बाद में ब्रेकअप हो जाता है, तो बदला लेने या दबाव बनाने के लिए पुरानी सहमति को ‘रेप’ में नहीं बदला जा सकता।”
कहाँ लागू होता है यह नियम?
- जहाँ दोनों पक्ष बालिग (Adults) हों।
- रिश्ता आपसी सहमति और प्रेम पर आधारित रहा हो।
- बाद में किसी कारणवश रिश्ता टूट गया हो।
कहाँ लागू नहीं होगा?
- नाबालिग से बनाए गए संबंध (POCSO का दायरा)।
- जबरन, डरा-धमकाकर या ब्लैकमेल करके बनाए गए संबंध।
- धोखाधड़ी की नीयत से शुरुआत से ही बोला गया झूठा वादा।
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश साफ है कि कानून आपसी सहमति का सम्मान करता है। समय बीतने या रिश्ते के खत्म हो जाने के बाद आपराधिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करके किसी पर दुष्कर्म का मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है। इस फैसले से फर्जी मामलों की रोकथाम और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को बल मिलेगा।
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