मुख्यमंत्री नहीं, मां के बेटे थे हेमंत सोरेन: हर बड़े कदम से पहले लेते थे रूपी सोरेन का आशीर्वाद, कल्पना को भी बेटी सा दिया प्यार, मुख्यमंत्री होने के बावजूद व्हीलचेयर पर खुद ले जाते थे मां को..
रूपी सोरेन और हेमंत सोरेन के रिश्ते की भावुक कहानी। जेल से लौटने के बाद मां से मुलाकात, आशीर्वाद लेने की तस्वीरें और कल्पना सोरेन के साथ रूपी सोरेन का आत्मीय रिश्ता जानिए

रांची। राजनीति में हेमंत सोरेन की पहचान झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में होती है। मंच पर वह भाषण देते हैं, फैसले लेते हैं और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हैं। लेकिन घर की चौखट के भीतर उनकी एक दूसरी पहचान थी—वह रूपी सोरेन के बेटे थे।
रूपी सोरेन के निधन के बाद मां-बेटे के रिश्ते से जुड़े वे तमाम पल फिर याद किए जा रहे हैं, जब मुख्यमंत्री की तमाम राजनीतिक पहचान पीछे छूट जाती थी और सामने सिर्फ एक मां और उसका बेटा नजर आता था। कहा जाता है कि जीवन में चाहे कितना भी बड़ा मुकाम क्यों न हासिल हो, मां के सामने बेटा वही रहता है। हेमंत सोरेन और रूपी सोरेन के रिश्ते की तस्वीरें भी कुछ ऐसी ही कहानी कहती हैं।
जेल से लौटे तो सबसे पहले मां के पास पहुंचे हेमंत
जून 2024 का वह दृश्य आज भी लोगों को याद है। लंबे कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम के बाद जब हेमंत सोरेन जेल से बाहर आए, तो वह सीधे अपने माता-पिता से मिलने मोरहाबादी स्थित आवास पहुंचे।घर पहुंचते ही रूपी सोरेन ने बेटे का तिलक लगाया और उसकी आरती उतारी।
यह दृश्य किसी राजनीतिक कार्यक्रम का नहीं था। वहां न मंच था, न भाषण और न राजनीतिक बयान।सामने सिर्फ मां थी, जो लंबे इंतजार के बाद अपने बेटे को अपने सामने देख रही थी।हेमंत सोरेन ने भी पिता शिबू सोरेन का आशीर्वाद लिया। उस वक्त सामने आई तस्वीरों में राजनीतिक घटनाक्रम से दूर एक परिवार की खुशी दिखाई दी थी।
बेटे के लौटने पर मां की आंखों में दिखी थी खुशी
इस मुलाकात का भाव इसलिए भी अलग था, क्योंकि हेमंत लंबे समय बाद अपने परिवार के बीच लौटे थे।राजनीति और कानूनी लड़ाई की खबरों के बीच उस दिन कैमरों में जो तस्वीर कैद हुई, उसमें हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री या राजनेता से ज्यादा एक बेटे के रूप में दिखाई दिए।और रूपी सोरेन के लिए वह उनका बेटा था, जो आखिरकार घर लौट आया था।
नेमरा में भी मां का आशीर्वाद लेने पहुंचे थे
मई 2024 में भी ऐसा ही एक भावुक दृश्य सामने आया था।हेमंत सोरेन अपने चाचा राजाराम सोरेन के श्राद्ध कर्म में शामिल होने के लिए अपने पैतृक गांव नेमरा पहुंचे थे। वहां उन्होंने अपने माता-पिता का आशीर्वाद लिया।बताया जाता है कि बेटे को सामने देखकर रूपी सोरेन भावुक हो गयी थीं।यह रिश्ता किसी राजनीतिक पद का मोहताज नहीं था। हेमंत चाहे मुख्यमंत्री हों या राजनीतिक संघर्ष के बीच हों, मां के सामने उनकी भूमिका हमेशा एक बेटे की ही रही।
बड़े फैसलों से पहले मां का आशीर्वाद
रूपी सोरेन के साथ हेमंत सोरेन का रिश्ता सिर्फ भावनात्मक मुलाकातों तक सीमित नहीं था।
परिवार से जुड़े लोगों और सामने आए कई मौकों से यह तस्वीर बनती रही कि हेमंत अपने जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों पर मां का आशीर्वाद लेना पसंद करते थे।राजनीति में कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले मां का आशीर्वाद लेना उनके लिए भावनात्मक सहारा रहा।यही वजह है कि रूपी सोरेन के निधन के बाद हेमंत सोरेन के लिए यह सिर्फ परिवार के एक सदस्य को खोना नहीं, बल्कि उस व्यक्ति को खोना है, जिसके सामने वह अपने सबसे बड़े राजनीतिक परिचय से पहले सिर्फ बेटा थे।
सिर्फ हेमंत ही नहीं, कल्पना सोरेन को भी मिला मां का प्यार
रूपी सोरेन का स्नेह सिर्फ अपने बेटों तक सीमित नहीं था।हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन के साथ भी उनका रिश्ता बेहद आत्मीय रहा। कल्पना जब सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय होने की ओर बढ़ रही थीं, तब रूपी सोरेन के साथ उनकी तस्वीरें भी सामने आई थीं।
इन तस्वीरों में सास-बहू का रिश्ता औपचारिक नहीं, बल्कि परिवार के भीतर के अपनत्व जैसा दिखाई देता था।कल्पना सोरेन के राजनीतिक जीवन में सक्रिय होने के दौर में रूपी सोरेन का साथ और आशीर्वाद उनके लिए भी महत्वपूर्ण रहा।
जब कल्पना राजनीति में आईं, मां रूपी की तस्वीर भी बनी चर्चा
कल्पना सोरेन के राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के शुरुआती दौर में रूपी सोरेन के साथ उनकी एक तस्वीर खूब चर्चा में रही थी।उस तस्वीर में राजनीति की शुरुआत कर रही कल्पना के साथ परिवार की वरिष्ठ महिला के रूप में रूपी सोरेन मौजूद थीं।
यह तस्वीर अपने आप में एक संदेश जैसी थी—सोरेन परिवार की राजनीतिक विरासत सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं रहने वाली थी। परिवार की एक नई पीढ़ी सामने आ रही थी और उसके पीछे परिवार का आशीर्वाद था।
शिबू सोरेन के संघर्ष के साथ घर को भी संभाला
रूपी सोरेन की अपनी कहानी भी कम संघर्षपूर्ण नहीं थी।शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन और राजनीति में लंबा संघर्ष किया। आंदोलन के दौर में उनका काफी समय घर से बाहर बीता। ऐसे में परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा रूपी सोरेन ने संभाला।
उन्होंने परिवार को उस दौर से गुजरते देखा, जब सोरेन परिवार के पास आज जैसी राजनीतिक ताकत नहीं थी।फिर उन्होंने अपने बच्चों को राजनीति में आगे बढ़ते देखा।बड़े बेटे दुर्गा सोरेन की राजनीति से लेकर उनके असमय निधन का दर्द सहा। हेमंत को मुख्यमंत्री बनते देखा। बसंत सोरेन को राजनीति में सक्रिय होते देखा और परिवार की अगली पीढ़ी को भी सार्वजनिक जीवन में आते देखा।
अब तस्वीरों में रह गया मां-बेटे का रिश्ता
रूपी सोरेन के निधन के बाद अब वे तमाम तस्वीरें और मुलाकातें सिर्फ पुरानी यादें नहीं रहीं।
मोरहाबादी के घर में मां का बेटे का तिलक करना।
नेमरा में बेटे का मां-बाप का आशीर्वाद लेना।
कल्पना सोरेन का रूपी सोरेन के साथ खड़ा होना।
और परिवार के हर बड़े पड़ाव पर रूपी सोरेन की मौजूदगी।
इन तस्वीरों को जोड़ें तो एक पूरी कहानी बनती है—एक ऐसे परिवार की कहानी, जिसकी राजनीति देश और राज्य में चर्चा का विषय रही, लेकिन जिसके भीतर रिश्तों की डोर एक मां ने थामे रखी।
मुख्यमंत्री के लिए अब मां का आशीर्वाद सिर्फ यादों में
हेमंत सोरेन के सामने अब भी वही राजनीतिक जिम्मेदारियां हैं। वही सरकार, वही चुनौतियां और वही सार्वजनिक जीवन।लेकिन निजी जिंदगी में एक खालीपन हमेशा रहेगा।अब किसी बड़े फैसले या महत्वपूर्ण मौके से पहले मां के पास जाकर आशीर्वाद लेने की वह सहजता नहीं होगी।रूपी सोरेन नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई सीख, उनका स्नेह और उनकी तस्वीरें परिवार के साथ रहेंगी।
राजनीति ने हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन रूपी सोरेन ने उन्हें हमेशा अपना बेटा ही माना। शायद यही वजह है कि मां के जाने के बाद उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान फिर वही बन गयी है—एक बेटे की, जिसने अपनी मां को खो दिया।












