‘वो शेरनी थी, निडर और बेबाक…’ जब शिबू सोरेन आंदोलन में थे, तब रूपी सोरेन ने संभाला था घर और जमीन का मोर्चा, रूपी सोरेन को कुछ इस तरह याद कर रहे लोग…
"She was a lioness—fearless and outspoken..." While Shibu Soren was involved in the movement, Rupi Soren held the fort at home and managed the land; this is how people are remembering Rupi Soren...

रांची: जिंदगी की जंग रूपी सोरेन आखिरकार हार गयी। कभी महाजनों का निडरता से मुकाबला करने वाली रूपी सोरेन ने महीनों से लड़ रही जिंदगी की जंग हार गयी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और दिशोम गुरू शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का आज देर शाम निधन हो गया। आज वो इस दुनिया में नहीं है, लेकिन झारखंड आंदोलन में उनकी निडरता और बेबाकी की कहानी सदियों तक याद रहेगी।
झारखंड आंदोलन की कहानी में एक मजबूत नाम है रूपी सोरेन।
झारखंड के दिग्गज नेता शिबू सोरेन की पत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन का निधन हो गया। उन्हें रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन के बाद रूपी सोरेन के जीवन के वे किस्से भी याद किए जा रहे हैं, जो बताते हैं कि आंदोलन के कठिन दौर में रूपी सोरेन सिर्फ घर की जिम्मेदारी संभालने वाली महिला नहीं थीं। जरूरत पड़ने पर वह खुद मोर्चे पर उतरने का साहस रखती थीं।
जब खेत पर कब्जा करने पहुंचा महाजन, हाथ में उठा लिया हसुआ
रूपी सोरेन के बारे में एक प्रचलित किस्सा है, जब एक बार बिष्टु साव नाम का एक महाजन कुछ लोगों के साथ उनके खेत पर पहुंचा और जमीन जोतने लगा। उस समय शिबू सोरेन जेल में थे।रूपी सोरेन ने इसका विरोध किया। लेकिन जब सामने वाला नहीं माना तो उन्होंने धान काटने वाला हसुआ उठा लिया और उसके पीछे दौड़ पड़ीं।
उन्होंने बताया था कि वह महाजन को पकड़ने में सफल रहीं। इसके बाद उन्होंने अपनी ननद को बुलाया और दोनों ने मिलकर उसका विरोध किया। मामला इतना बढ़ा कि महाजन को वहां से भागना पड़ा।रूपी सोरेन के इस किस्से में सिर्फ गुस्सा नहीं था। इसके पीछे उस दौर की वह मजबूरी और दृढ़ता भी थी, जब पति आंदोलन के कारण अक्सर घर से दूर रहते थे और परिवार तथा जमीन की जिम्मेदारी घर की महिलाओं को ही संभालनी पड़ती थी।
चाचा ने कहा- ताकतवर लोगों से मत उलझो, जवाब मिला- जमीन हमारी है
जमीन विवाद के दौरान परिवार के एक चाचा ने उन्हें समझाया था कि सामने वाले लोग ताकतवर हैं और उनसे उलझना ठीक नहीं होगा।लेकिन रूपी सोरेन पीछे हटने को तैयार नहीं थीं। उनका सवाल सीधा था—अगर अपनी जमीन पर कोई कब्जा कर रहा है, तो उसका विरोध क्यों न किया जाए?उन्होंने चाचा से किनारे रहने को कहा और खुद मामले से निपटने का भरोसा जताया।यही तेवर उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गया था।
पुलिस घर पहुंचती थी, तो रूपी सोरेन का जवाब होता था- ‘यह मेरा घर है’
शिबू सोरेन के आंदोलन और फरारी के दिनों में पुलिस का दबाव परिवार तक भी पहुंचता था।रूपी सोरेन के अनुसार, करीब 1970 के आसपास पुलिस अक्सर घर पहुंचती और उनसे शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ करती थी।एक बार पुलिस ने जब उनसे लगातार सवाल किए तो उन्होंने कथित तौर पर दो टूक जवाब दिया—
“यह शिबू सोरेन का घर नहीं है, रूपी सोरेन का घर है।”
उन्होंने पुलिस से कहा था कि शिबू सोरेन जहां होंगे, वहां जाकर उन्हें खोजा जाए।
उस दौर में पुलिस के सामने इस तरह बेबाकी से जवाब देना आसान नहीं था। लेकिन रूपी सोरेन के भीतर का आत्मविश्वास और निर्भीकता शायद इसी तरह के क्षणों में सबसे ज्यादा दिखाई देती थी।
जब पति जंगलों में थे, पत्नी खुद उन्हें खोजने निकल पड़ी
शिबू सोरेन आंदोलन के दिनों में टुंडी के आसपास के जंगल-पहाड़ों में रहते थे। परिवार को उनकी कोई खबर नहीं मिलती थी।रूपी सोरेन ने बताया था कि एक समय हालात से परेशान होकर उन्होंने खुद जंगल में जाकर उन्हें खोजने का फैसला किया।
वह अपनी सास और ननद के साथ जंगल की ओर निकल पड़ीं। उस समय उनकी गोद में उनका बेटा दुर्गा था।तीनों ने जंगल और पहाड़ी इलाकों में काफी भटककर शिबू सोरेन को खोजने की कोशिश की।कल्पना कीजिए उस समय की परिस्थितियों की—एक तरफ आंदोलन में शामिल पति, दूसरी तरफ पुलिस का दबाव, घर में बच्चे और परिवार की जिम्मेदारी। इसके बावजूद रूपी सोरेन पीछे नहीं हटीं।
आंदोलन की कहानी में यह भी एक ‘मोर्चा’ था
झारखंड आंदोलन की चर्चा अक्सर बड़े नेताओं, सभाओं, जंगलों और राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में होती है। लेकिन आंदोलनकारियों के पीछे खड़े परिवारों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण थी।शिबू सोरेन जब आंदोलन में सक्रिय थे, तब परिवार को संभालना, जमीन की रक्षा करना, पुलिस के सवालों का सामना करना और बच्चों की जिम्मेदारी उठाना—ये सब भी एक तरह का संघर्ष था।
रूपी सोरेन ने यह संघर्ष चुपचाप नहीं, बल्कि अपने अंदाज में किया।उनकी कहानी बताती है कि झारखंड आंदोलन की जमीन पर सिर्फ पुरुष ही नहीं लड़ रहे थे। घर की चौखट पर महिलाएं भी अपने हिस्से का मोर्चा संभाल रही थीं।
आज अस्पताल में जिंदगी की जंग, पीछे छूट गईं संघर्ष की यादें
आज रूपी सोरेन जब इस दुनिया में नहीं हैं। तो उन्हें उनके चाहने वाले बड़ी शिद्दत से याद कर रहे हैं। रूपी सोरेन के जीवन की कहानी सिर्फ बीमारी और अस्पताल तक सीमित नहीं है।वह उस दौर की महिला थीं, जब शिबू सोरेन आंदोलन की राह पर थे और परिवार को कई मुश्किल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता था।
ऐसे समय में रूपी सोरेन ने परिवार के भीतर रहकर भी अपनी लड़ाई खुद लड़ी।जमीन पर कब्जे की कोशिश हो या पुलिस की पूछताछ, जंगलों में पति की तलाश हो या परिवार की जिम्मेदारी—हर मोर्चे पर उनका अंदाज एक जैसा रहा।
बेधड़क, बेबाक और निडर।
शायद इसी वजह से उनके जीवन से जुड़े किस्सों को याद करते हुए उन्हें ‘शेरनी’ कहना अतिशयोक्ति नहीं लगता। यह उस महिला की कहानी है, जिसने झारखंड के एक बड़े राजनीतिक परिवार की नींव में अपनी चुपचाप लेकिन मजबूत भूमिका निभाई।












